Jeevan dharam

Krishna sakhi is about our daily life routine, society, culture, entertainment, lifestyle.

Friday, 1 September 2017

เค‡เคธ เคŸोเคŸเค•े เค•ो เค•เคฐเคจे เคธे เคนोเค—ा เคงเคจ เคฒाเคญ

No comments :

जीवन में कई तरह की मुश्किलें आती हैं। व्यक्ति हर तरह की मुसीबतों से जुझता हुआ आगे बढ़ता जाता है लेकिन धन का अभाव एक ऐसी समस्या है जिससे जुझते हुए जीवन बिताना सबसे मुश्किल काम है। धन की कमी से उबरने और अपने जीवन को सुखमय बनाने के लिए सावन में शिव की आराधना से सरल कोई और उपाय नहीं है। धन से जुड़ी समस्या से निजात पाने के लिए सावन मास के किसी शुक्रवार को यह साधारण टोटका करें-

टोटका

श्रावण मास के किसी शुक्रवार को यथाशक्ति (जितना संभव हो) चावल भगवान शिव मंदिर ले जाएं। अब अपने दोनों हाथों में जितने चावल आ जाएं उतने शिवजी को अर्पण कर दें और भगवान शिव से धन प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें। जितने अक्षत के दानें शिवजी को अर्पण किए जाते हैं, उसका उतने ही हजार गुना फल मिलता है। अब बचा हुआ चावल गरीबों में बांट दें। यह धन प्राप्ति का अचूक उपाय है।

เค—ोเค˜ृเคค เค•ा เคšिเค•िเคค्เคธा เคฎें เค‰เคชเคฏोเค—

No comments :

आयुर्वेद के मतानुसार देशी गाय का घी अमृत के समान स्वास्थ्य-कारक, रसायन, अग्निप्रदीपक, शक्ति, बल, वृध्दि, कांति, लावण्य, तेज, आयुष्यवर्ध्दक है। यह स्निग्ध, सुगंधित, रुचिकर, मेधा एवं स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाला, शुक्रवर्ध्दक, विषनाशक, त्रिदोष नाशक, श्रम निवारक और स्वर को मधुरता प्रदान करता है। गाय का घी हमेशा दूध को जमाकर, दही बनाकर उसे मथकर मक्खन निकालना चाहिए और उसे गरम करके घी बनाना चाहिए। क्रीम से बनाया हुआ घी अपेक्षाकृत कम उपयोगी होता है। गाय के घी से माइग्रेन, रक्तविकार, पाण्डु, कामला, उदावर्त, फोड़े-फुंसी, जोड़ों के दर्द, चोट, सूजन, सफेद दाग एवं कुष्ट रोग की चिकित्सा होती है। अनेक आयुर्वेदिक शास्त्रीय योगों में गाय के घी का उपयोग किया जाता है। कई आयुर्वेदिक फार्मेसियां घृत बनाकर बेचती भी हैं। जैसे अर्जुन घृत-हृदय रोग, महापंचागव्य घृत-मिर्गी, अनिद्रा, स्मृति क्षीण आदि, मृत्युश्चश्रेदी घृत-सांप, विषैले कीट एवं चूहों का विष नाशक, फल घृत-वंध्या दोष नाशक, महागौर्याद्य घृत-नासूर, जख्म एवं घाव, पंचकोलादि घृत या षज्ञपटल घृत-गुल्म, ज्वर, उगर रोग, ग्रहणी, मंदाग्नि, श्वास, कांस, शोथ एवं ऊर्ध्व वायु नाशक। चर्म रोग एवं फोड़ों पर लगाने के लिये गाय के घी को बार-बार पानी में धोकर प्रयोग करना चाहिए। पानी से धोया हुआ घी खाने में प्रयोग करना चाहिए। ज्वर, हैजा, अरुचि, मंदाग्नि आदि रोगों में घी का उपयोग नहीं करना चाहिए।

पुराना घृत : गाय का घी जितना पुराना होता जाता है, उतना ही गुणवर्ध्दक होता जाता है। पुराना घी तीक्ष्ण, खट्टा, तीखा, उष्ण, श्रवण शक्ति को बढ़ाने वाला घाव को मिटाने वाला, योनि रोग, मस्तक रोग, नेत्र रोग, कर्ण रोग, मूच्छा, ज्वर, श्वांस, खांसी, संग्रहणी, उन्माद, कृमि, विष आदि दोषों को नष्ट करता है। दर वर्ष पुराने घी को कोंच, ग्यारह वर्ष पुराने घी को महाघृत कहते हैं।
गो घृत के प्रयोग : यज्ञ में देशी गाय के घी की आहुतियां देने से पर्यावरण शुध्द होता है। गाय के घी में चावल मिलाकर यज्ञ में आहुतियां देने से इथिलीन आक्साइड और फाममोल्डिहाइड नामक यौगिक गैस के रूप में उत्पन्न होते हैं। इससे प्राण वायु शुध्द होती है। ये दोनों यौगिक जीवाणरोधक होते हैं। इनका प्रयोग आपरेशन थियेटर को कीटाणु रहित बनाने में आज भी किया जाता है। प्रातः सूर्योदय के समय एवं सायंकाल सूर्यास्त के समय गाय का घी और चावल मिलाकर दो-दो आहूतियां निम्नलिखित मंत्र से देने पर आसपास का वातावरण कीटाणुरहित हो जाता है। अग्नि में घी और चावल की आहुतियां निम्नलिखित मंत्र बोलकर देनी चाहिए-
सूर्योदय के समय : प्रजापतये स्वाहा।
प्रजापतये इदं न मम।
सूर्याय स्वाहा, सूर्याय इदं न मम।
सूर्यास्त के समय : प्रजापतये स्वाहा।
प्रजापतये इदं न मम।
अग्नये स्वाहा, अग्नये इदं न मम।

गाय क घी से आहुतियां देने पर यह देखा गया है कि जितनी दूर तक यज्ञ के धुएं का प्रभाव फैलता है, उतनी ही दूर तक वायुमंडल में किसी प्रकार के कीटाणु नहीं रहते। वह क्षेत्र पूरी तरह से कीटाणुओं से मुक्त हो जाता है। कृत्रिम वर्षा कराने के लिए वैज्ञानिक, प्रोपलीन आक्साइड गैस का प्रयोग करते हैं। गाय के घी से आहुति देने पर यह गैस प्राप्त होती है। प्राचीन काल में भू-जल का उपयोग कृषि में सिंचाई के लिए नहीं किया जाता था। यज्ञ होते रहने से समय-समय पर वर्षा होती रहती थी।
गो घृत का औषधीय उपयोग : स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए प्रतिदिन रात्रि को सोते समय गो-दो बूंद देशी गाय का गुनगुना घी दोनों नाक के छेदों में डालें। यह घी रात भर मस्तिष्क को प्राणवायु पहुंचाता रहता है और विद्युत तरंगों से मस्तिष्क को चार्ज करता रहता है। इससे मस्तिष्क की शक्ति बहुत बढ़ जाती है। यदि यह क्रिया प्रातः, अपराह्न और रात को सोते समध कई माह तक की जाती रहे तो श्वास के प्रवाह में आने वाली बाधाएं दूर हो जाती हैं और अनेक पुराने रोग ठीक हो जाते हैं। शुष्कता, सूजन, रक्तस्राव, सर्दी, सायनस संक्रमण, नासिका गिल्टी आदि ठीक हो जाते हैं और वायु मार्ग खुल जाने से श्वास की बाधा दूर हो जाती है। नाक में घी डालने के साथ-साथ दो बूंद घी नाभि में डालें और फिर अंगुली से दोनों ओर थोड़ी देर घुमाएं। गाय का घी अपने हाथ से पांव के तलवों पर मालिश करें, इससे बहुत अच्छी नींद आती है, शांति और आनन्द प्राप्त होता है।

Thursday, 31 August 2017

॥ เคฏเคฎुเคจाเคท्เคŸเค•เคฎ् ॥

No comments :
(เฅง)
เคจเคฎाเคฎि เคฏเคฎुเคจाเคฎเคนं เคธเค•เคฒ เคธिเคฆ्เคงि เคนेเคคुं เคฎुเคฆा, เคฎुเคฐाเคฐि เคชเคฆ เคชंเค•เคœ เคธ्เคซ़ुเคฐเคฆเคฎเคจ्เคฆ เคฐेเคฃुเคค्เค•เคŸाเคฎ।
เคคเคŸเคธ्เคฅ เคจเคต เค•ाเคจเคจ เคช्เคฐเค•เคŸเคฎोเคฆ เคชुเคท्เคชाเคฎ्เคฌुเคจा, เคธुเคฐाเคธुเคฐเคธुเคชूเคœिเคค เคธ्เคฎเคฐเคชिเคคुः เคถ्เคฐिเคฏं เคฌिเคญ्เคฐเคคीเคฎ॥
(เฅจ)
เค•เคฒिเคจ्เคฆ เค—िเคฐि เคฎเคธ्เคคเค•े เคชเคคเคฆเคฎเคจ्เคฆเคชूเคฐोเคœ्เคœ्เคตเคฒा, เคตिเคฒाเคธเค—เคฎเคจोเคฒ्เคฒเคธเคค्เคช्เคฐเค•เคŸเค—เคฃ्เคก्เคถैเคฒोเคจ्เคจ्เคคा।
เคธเค˜ोเคทเค—เคคि เคฆเคจ्เคคुเคฐा เคธเคฎเคงिเคฐूเคขเคฆोเคฒोเคค्เคคเคฎा, เคฎुเค•ुเคจ्เคฆเคฐเคคिเคตเคฐ्เคฆ्เคงिเคจी เคœเคฏเคคि เคชเคฆ्เคฎเคฌเคจ्เคงोः เคธुเคคा॥
(เฅฉ)
เคญुเคตं เคญुเคตเคจเคชाเคตเคจीเคฎเคงिเค—เคคाเคฎเคจेเค•เคธ्เคตเคจैः, เคช्เคฐिเคฏाเคญिเคฐिเคต เคธेเคตिเคคां เคถुเค•เคฎเคฏूเคฐเคนंเคธाเคฆिเคญिः।
เคคเคฐंเค—เคญुเคœเค•ंเค•เคฃ เคช्เคฐเค•เคŸเคฎुเค•्เคคिเค•ाเคตाเค•ुเค•ा, เคจिเคคเคจ्เคฌเคคเคŸเคธुเคจ्เคฆเคฐीं เคจเคฎเคค เค•ृเคท्เคฃ्เคคुเคฐ्เคฏเคช्เคฐिเคฏाเคฎ॥
(เฅช)
เค…เคจเคจ्เคคเค—ुเคฃ เคญूเคทिเคคे เคถिเคตเคตिเคฐंเคšिเคฆेเคตเคธ्เคคुเคคे, เค˜เคจाเค˜เคจเคจिเคญे เคธเคฆा เคง्เคฐुเคตเคชเคฐाเคถเคฐाเคญीเคท्เคŸเคฆे।
เคตिเคถुเคฆ्เคง เคฎเคฅुเคฐाเคคเคŸे เคธเค•เคฒเค—ोเคชเค—ोเคชीเคตृเคคे, เค•ृเคชाเคœเคฒเคงिเคธंเคถ्เคฐिเคคे เคฎเคฎ เคฎเคจः เคธुเค–ं เคญाเคตเคฏ॥
(เฅซ)
เคฏเคฏा เคšเคฐเคฃเคชเคฆ्เคฎเคœा เคฎुเคฐเคฐिเคชोः เคช्เคฐिเคฏं เคญाเคตुเค•ा, เคธเคฎाเค—เคฎเคจเคคो เคญเคตเคค्เคธเค•เคฒเคธिเคฆ्เคงिเคฆा เคธेเคตเคคाเคฎ।
เคคเคฏा เคธเคน्เคถเคคाเคฎिเคฏाเคค्เค•เคฎเคฒเคœा เคธเคชเคค्เคจीเคตเคฏ, เคนเคฐिเคช्เคฐिเคฏเค•เคฒिเคจ्เคฆเคฏा เคฎเคจเคธि เคฎे เคธเคฆा เคธ्เคฅीเคฏเคคाเคฎ॥
(เฅฌ)
เคจเคฎोเคธ्เคคु เคฏเคฎुเคจे เคธเคฆा เคคเคต เคšเคฐिเคค्เคฐ เคฎเคค्เคฏเคฆ्เคญुเคคं, เคจ เคœाเคคु เคฏเคฎเคฏाเคคเคจा เคญเคตเคคि เคคे เคชเคฏः เคชाเคจเคคः।
เคฏเคฎोเคชि เคญเค—िเคจीเคธुเคคाเคจ เค•เคฅเคฎुเคนเคจ्เคคि เคฆुเคท्เคŸाเคจเคชि, เคช्เคฐिเคฏो เคญเคตเคคि เคธेเคตเคจाเคค्เคคเคต เคนเคฐेเคฐ्เคฏเคฅा เค—ोเคชिเค•ाः॥
(เฅญ)
เคฎเคฎाเคธ्เคคु เคคเคต เคธเคจ्เคจिเคงौ เคคเคจुเคจเคตเคค्เคตเคฎेเคคाเคตเคคा, เคจ เคฆुเคฐ्เคฒเคญเคคเคฎाเคฐเคคिเคฐ्เคฎुเคฐเคฐिเคชौ เคฎुเค•ुเคจ्เคฆเคช्เคฐिเคฏे।
เค…เคคोเคธ्เคคु เคคเคต เคฒाเคฒเคจा เคธुเคฐเคงुเคจी เคชเคฐं เคธुंเค—เคฎाเคค्เคคเคตैเคต, เคญुเคตि เค•ीเคฐ्เคคिเคคा เคจ เคคु เค•เคฆाเคชि เคชुเคท्เคŸिเคธ्เคฅिเคคैः॥
(เฅฎ)
เคธ्เคคुเคคि เคคเคต เค•เคฐोเคคि เค•ः เค•เคฎเคฒเคœाเคธเคชเคค्เคจि เคช्เคฐिเคฏे, เคนเคฐेเคฐ्เคฏเคฆเคจुเคธेเคตเคฏा เคญเคตเคคि เคธौเค–्เคฏเคฎाเคฎोเค•्เคทเคคः।
เค‡เคฏं เคคเคต เค•เคฅाเคงिเค•ा เคธเค•เคฒ เค—ोเคชिเค•ा เคธंเค—เคฎ, เคธ्เคฎเคฐเคถ्เคฐเคฎเคœเคฒाเคฃुเคญिः เคธเค•เคฒ เค—ाเคค्เคฐเคœैः เคธंเค—เคฎः॥
(เฅฏ)
เคคเคตाเคท्เคŸเค•เคฎिเคฆं เคฎुเคฆा เคชเค เคคि เคธूเคฐเคธूเคคे เคธเคฆा, เคธเคฎเคธ्เคคเคฆुเคฐिเคคเค•्เคทเคฏो เคญเคตเคคि เคตै เคฎुเค•ुเคจ्เคฆे เคฐเคคिः।
เคคเคฏा เคธเค•เคฒเคธिเคฆ्เคงเคฏो เคฎुเคฐเคฐिเคชुเคถ्เคš เคธเคจ्เคคुเคท्เคฏเคคि, เคธ्เคตเคญाเคตเคตिเคœเคฏो เคญเคตेเคค เคตเคฆเคคि เคตเคฒ्เคฒเคญः เคถ्เคฐी เคนเคฐेः॥

॥ เคนเคฐि: เฅ เคคเคค् เคธเคค् ॥