Jeevan dharam

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Tuesday, 6 November 2018

เค•िเคธ เคคเคฐเคน เคธीเคคा เคนै เคฐाเคตเคฃ เค•ी เคชुเคค्เคฐी

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एक बार गृत्स्मद नामक ब्राह्मण अपनी पुत्री के रूप में लक्ष्मी को पाने के पूजा अर्चना करते रहते है | वे हर दिन पूजा अर्चना कर एक कलश में मंत्रोच्चारण के साथ दूध की कुछ बुँदे इसमे डालते रहते है | एक दिन वो ऋषि वहा नही होते और उनके पीछे से उस जगह रावण पहुँच जाता है और ऋषियों का वध करके उनका रक्त उस कलश में डालकर लंका ले आता है | मंदोदरी को यह कलश त्रिक्षण विष बताकर दे दिया जाता है |

कुछ दिनों के लिए फिर रावण विहार के लिए चले जाते है पर उनकी पत्नी मन्दोदरी उनकी किसी बात से बहूत दुखी होती है और अपनी आत्महत्या के लिए उसी कलश से जहर का सेवन कर लेती है | पर यह वरदानी कलश होने से वो मरने की बजाय गर्भवती हो जाती है | रावण की अनुपस्थी में इस तरह गर्भवती होना रावण के क्रोध को जगाने जैसा था |

यह सोचकर वे भी तीर्थ यात्रा के बहाने कुरुक्षेत्र आ जाती है और अपने गर्भ को निकालकर भूमि में दफना देती है | इसके बाद पुनः लंका आ जाती है | समय के साथ यह भ्रूण परिपक्व हो जाता है |

एक दिन मिथिला के राजा जनक जब इस जमीन पर हल चला रहे होते है तब धरा को जोतने से उन्हें यह पुत्री प्राप्त होती है जो जनक नंदिनी कहलाती है | पर इस कथा के अनुसार तो सीता की माँ रावण की पत्नी मंदोदरी ही हुई |


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एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के दर्शन हेतु सनक, सनंदन आदि ऋषि बैकुंठ पधारे परंतु भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय ने उन्हें प्रवेश देने से इंकार कर दिया। ऋषिगण अप्रसन्न हो गए और क्रोध में आकर जय-विजय को शाप दे दिया कि तुम राक्षस हो जाओ। जय-विजय ने प्रार्थना की व अपराध के लिए क्षमा माँगी। भगवान विष्णु ने भी ऋषियों से क्षमा करने को कहा। तब ऋषियों ने अपने शाप की तीव्रता कम की और कहा कि तीन जन्मों तक तो तुम्हें राक्षस योनि में रहना पड़ेगा और उसके बाद तुम पुनः इस पद पर प्रतिष्ठित हो सकोगे। इसके साथ एक और शर्त थी कि भगवान विष्णु या उनके किसी अवतारी-स्वरूप के हाथों तुम्हारा मरना अनिवार्य होगा।

यह शाप राक्षसराज, लंकापति, दशानन रावण के जन्म की आदि गाथा है। भगवान विष्णु के ये द्वारपाल पहले जन्म में हिरण्याक्ष व हिरण्यकशिपु राक्षसों के रूप में जन्मे। हिरण्याक्ष राक्षस बहुत शक्तिशाली था और उसने पृथ्वी को उठाकर पाताल-लोक में पहुँचा दिया था। पृथ्वी की पवित्रता बहाल करने के लिए भगवान विष्णु को वराह अवतार धारण करना पड़ा था। फिर विष्णु ने हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को मुक्त कराया था। हिरण्यकशिपु भी ताकतवर राक्षस था और उसने वरदान प्राप्तकर अत्याचार करना प्रारंभ कर दिया था। भगवान विष्णु द्वारा अपने भाई हिरण्याक्ष का वध करनेकी वजह से हिरण्यकशिपु विष्णु विरोधी था और अपने विष्णुभक्त पुत्र प्रह्लाद को मरवाने के लिए भी उसने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। फिर भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार धारण कर हिरण्यकशिपु का वध किया था। खंभे से नृसिंह भगवान का प्रकट होना ईश्वर की शाश्वत, सर्वव्यापी उपस्थिति का ही प्रमाण है।





त्रेतायुग में ये दोनों भाई रावण और कुंभकर्ण के रूप में पैदा हुए और विष्णु अवतार श्रीराम के हाथो मारे गए। तीसरे जन्म में द्वापर युग में जब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया, तब ये दोनों शिशुपाल व दंतवक्त्र नाम के अनाचारी के रूप में पैदा हुए थे। इन दोनों का भी वध भगवान श्रीकृष्ण के हाथों हुआ।


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एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के दर्शन हेतु सनक, सनंदन आदि ऋषि बैकुंठ पधारे परंतु भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय ने उन्हें प्रवेश देने से इंकार कर दिया। ऋषिगण अप्रसन्न हो गए और क्रोध में आकर जय-विजय को शाप दे दिया कि तुम राक्षस हो जाओ। जय-विजय ने प्रार्थना की व अपराध के लिए क्षमा माँगी। भगवान विष्णु ने भी ऋषियों से क्षमा करने को कहा। तब ऋषियों ने अपने शाप की तीव्रता कम की और कहा कि तीन जन्मों तक तो तुम्हें राक्षस योनि में रहना पड़ेगा और उसके बाद तुम पुनः इस पद पर प्रतिष्ठित हो सकोगे। इसके साथ एक और शर्त थी कि भगवान विष्णु या उनके किसी अवतारी-स्वरूप के हाथों तुम्हारा मरना अनिवार्य होगा।

यह शाप राक्षसराज, लंकापति, दशानन रावण के जन्म की आदि गाथा है। भगवान विष्णु के ये द्वारपाल पहले जन्म में हिरण्याक्ष व हिरण्यकशिपु राक्षसों के रूप में जन्मे। हिरण्याक्ष राक्षस बहुत शक्तिशाली था और उसने पृथ्वी को उठाकर पाताल-लोक में पहुँचा दिया था। पृथ्वी की पवित्रता बहाल करने के लिए भगवान विष्णु को वराह अवतार धारण करना पड़ा था। फिर विष्णु ने हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को मुक्त कराया था। हिरण्यकशिपु भी ताकतवर राक्षस था और उसने वरदान प्राप्तकर अत्याचार करना प्रारंभ कर दिया था। भगवान विष्णु द्वारा अपने भाई हिरण्याक्ष का वध करनेकी वजह से हिरण्यकशिपु विष्णु विरोधी था और अपने विष्णुभक्त पुत्र प्रह्लाद को मरवाने के लिए भी उसने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। फिर भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार धारण कर हिरण्यकशिपु का वध किया था। खंभे से नृसिंह भगवान का प्रकट होना ईश्वर की शाश्वत, सर्वव्यापी उपस्थिति का ही प्रमाण है।





त्रेतायुग में ये दोनों भाई रावण और कुंभकर्ण के रूप में पैदा हुए और विष्णु अवतार श्रीराम के हाथो मारे गए। तीसरे जन्म में द्वापर युग में जब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया, तब ये दोनों शिशुपाल व दंतवक्त्र नाम के अनाचारी के रूप में पैदा हुए थे। इन दोनों का भी वध भगवान श्रीकृष्ण के हाथों हुआ।